आज फिर दिल कुछ अनमना
सा है.
मचल रहा है किसी अनजानी
सी चीज के लिए.
जब कभी भी तस्सवुर
को सांचे में ढालना चाह
कुछ अजीब सा ही नजर
आता है ढांचा उसका.
छोटे बच्चों सी हरकते
हो गई है मेरी
सच बोलता हूँ, जिद
करता हूँ, जिन्दगी जीना चाहता हूँ.
पर नहीं मै तो बड़ा
हो गया हूँ न
इन सब पे अब मेरा इख़्तियार
नहीं
तो सोच के बोलना जो
मेरी आदत नहीं
सम्हाल के हँसना जो
मेरी फितरत नहीं
कर रहा हूँ रस्म अद्य्गी
की तरह
दुआ मांगता हूँ की
कम से कम एक बार तो वो सुने
न पूरी जिन्दगी पर
कुछ लम्हे तो जी लेने दे.
Saturday, February 25, 2012
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