Wednesday, February 22, 2012

22-2-2012
आज फिर एक
तंग सुबह से
सामना हुआ
फिर सोचा क्यूँ
दोड़ती है दुनिया
इस तरह
क्यूँ कोई रुक
कर सोचता नहीं
कंहा पहुचना है कुछ
पता नहीं
बस आगे वाली
गाड़ी का बम्प्पर
ही रहा गया
है निगाह में.
उसके आगे न
दिखता है न
कोई देखना चाहता

कोई होर्न दे तो
स्पीड बड़ा दो
पित्ज़ा डेलिवेरी बॉय तो
क्या ambulance को भी
रास्ता न दो.
भाग के कंहा
पन्हुचोगे ये तो
पता कर लो
कल मजिल बदल
जायेगी.
कंही दुसरे ठिकाने के
लिए निकलोगे पर
फिर भी कुछ
नहीं बदलेगा

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